
प्रतिरोध की स्थिति में हम सब कबीर को क्यों याद करते हैं? क्या कबीर आज भी हमारे दैनिक जीवन में सामाजिक आर्थिक राजनीतिक प्रतिरोध के सबसे देसी प्रतीक हैं? जब भी संघर्ष पर उतरता है कबीर की तरह लगने या कहलाने लगता है। ऐसी क्या बात रही है कबीर में कि वे आज के पल-पल बदलते प्रेरणास्त्रोंतों आदर्शों के दौर में भी स्थायी भाव से टिके हुए हैं। युवाओं को भी कबीर वैसे ही आकर्षित करते हैं जैसे उन पर शोध करने वालों को। कई बार लगता है कि कबीर को जितना उन्हें जाननेवाले विद्वान नहीं जीते उससे कहीं ज्यादा कबीर को आमजन जीता है। किसी भी घुटन भरे मकान से निकलने के लिए कबीर खिड़की का काम करते हैं। इसीलिए उनकी पहचान जातिधर्म की नहीं है। आंखें बंद कर कबीर की कल्पना कीजिए तो किसी तस्वीर का अहसास नहीं होता बल्कि उनकी बानी सुनाई देती है।
विद्वान कबीर को जितना ही अजूबा बना लें मगर आम लोगों के बीच कबीर आज भी सहज हैं। इसीलिए हर बागी हर सादा आदमी कबीर-फकीर से तुलना पाता है। कबीर के लिए सब दोस्त हैं। कहत कबीर सुनो भाई साधो। वे सभी जातियों के पाखंड से टकराते हैं । इस धारणा को ग़लत साबित किया कि मानवाधिकार का विकास यूरोप से बाहर हुआ ही नहीं।
कबीर कौन है? कबीर एक मानस है। आज के उदारीकरण के दौर में कई बाज़ारू लोग जीवन,आत्मसम्मान और मुक्ति का मार्ग बताने के विशेषज्ञ बने घूमते हैं। उनके पास हर परिस्थितियों के फार्मूले तैयार हैं। वो स्लोगन बेचते हैं। इन्हें मोटिवेशनल स्पीकर कहते हैं। जिन्हें आप हिन्दी में प्रेरक-वाचक कह सकते हैं। जैसे ही आप कबीर को पढ़ना शुरू करते हैं आपको जीवन जीने के मुफ्त में कई फार्मूले मिल जाते हैं। समाज को समझने का नज़रिया तो मिलता ही है,उससे लड़ने का हथियार भी। आज पेशेवर दफ्तरों में एक किस्म का सामंती ढांचा खड़ा किया जा रहा है। जहां आदमी का सबसे ज़्यादा वक्त गुज़रता है। यहां हैसियत के इतने पायदान हैं कि नीचे खड़ा हर व्यक्ति जब तक कबीरबोध का पालन नहीं करता वो अपने आप को संभाल नहीं पाता है। मगर इसे कारोबार में बदलने के लिए प्रेरक-वाचक आपको सकारात्मक सोच के बहाने समझौतावादी बनाने की चतुराई सीखाते हैं। कबीर चतुर नहीं बनाते। बागी बनाते हैं। एक ऐसा बागी जो अपने समय और समाज की बारीक समझ रखता है और विकल्प पेश करता है।
कबीर का मतलब होता है “महान” . कबीर को "कब" किसने और कैसे महान बनाया और क्यूँ बनाया...आज भी बहुतो की समझ से परे है |
वैसे कबीर , अल्लाह के ९९ नामों में से एक है , जो की कुरान में वर्णित हैं |(सैंतीसवें नाम के रूप में)
इनका जन्म कब हुआ, कहाँ हुआ ,किसके यहाँ हुआ किसी को नहीं पता , आज भी लोग इन्हें नीरू और उनकी पत्नी नीमा की दत्तक संतान के रूप में मानते हैं |
वैसे आप सोच रहे होंगे की इसे आज अचानक से क्या हो गया जो की कबीर साब के पीछे पड़ गया है |
आपकी जानकारी के लिए बता दूं की हुआ कुछ नहीं है , धन्यवाद उन दोस्तों को जिन्होंने अपने प्रियजनों या अपने नाम के माध्यम से इस भले मानुष को जिन्दा रखा है |
वैसे आज की परिस्थिति ये है के राह चलते किसी से इनके दो दोहे पूछ लो तो अगला बगलें झांकते नज़र आएगा |
काशी के इस अक्खड़, निडर एवं संत कवि का जन्म लहरतारा के पास सन् १३९८ में ज्येष्ठ पूर्णिमा को हुआ था । जुलाहा परिवार में पालन पोषण हुआ, संत रामानंद के शिष्य बने और अलख जगाने लगे। कबीर सधुक्कड़ी भाषा में किसी भी सम्प्रदाय और रूढ़ियों की परवाह किये बिना खरी बातों की पंचमेल खिचड़ी पकाया करते थे ।
वैसे खरी बातें कहने वाले आज भी गली , नुक्कड़ों पर मिल जायेंगे ,
मगर यह जमाना commercialization का है ... वो जमाना कुछ और था |
साखियों की भाषा किताबों में ही रह गयी है , शिक्षकों के माध्यम से बच्चों का course पूरा करने के लिए , वो भी समय से पूरा न हुआ तो स्कूल के बोर्ड ऑफ़ डिरेक्टोर्स को सफाई भी देनी पड़ेगी का डर बना रहता है |
कबीर भाई साब आपको तनाव कम करने के लिए याद किया था , तनाव बढ़ने के लिए नहीं .
कबीर के ही शब्दों में- 'हम कासी में प्रकट भये हैं, रामानन्द चेताये'। आज भी अन्नाओ के ज़माने में रामानंद की जरुरत सी जान पड़ती है, इतिहास के पन्नो पर आपको रामानंद सागर तो मिलजाएंगे पर कबीर वाला रामानंद नहीं मिलेगा |
आज हमारे ज्यादातर रिश्ते व्यापारिक आर्थिक गतिविधियों से तय हो रहे हैं। जाति संबंधों में जड़ता है तो दूसरी तरफ बदलाव भी है। व्यापार पर जाति का वर्चस्व टूट रहा है। हम कपड़ों की तरह शहर बदल रहे हैं। हर दिन आधुनिकता बदल रही है। आधुनिकता पहले से कहीं अस्थायी हो गई है। मार्डन होना अब फैशन नहीं रहा। जीवन को समृद्ध करने वाले मुहावरे,तंज और किंवदंतियां खत्म हो रहे हैं। हमारी मानसिकता शहरी या कस्बाई नहीं बल्कि अपार्टमेंटी और दफ्तरी होने लगी है। फ्लैट और दफ्तर के बीच पड़ने वाले शहर को भी ठीक से नहीं जानते। नई पहचान बन रही है तो ऐसे में आधुनिकता को नए सिरे से पहचानने के लिए सबसे बड़ा सहारा कौन हो सकता है? कबीर?
सवाल यह है कि क्या हमें कबीर चाहिए? एक ऐसा कबीर जो शाश्वत कबीर की तरह हिन्दू मुसलमान के खांचे में फिट न किया जा सके। जो माया और जात के खिलाफ खड़ा हो। जो खापों पर तंज करता हो और संसद की सर्वोच्चता के जड़वत सिद्धांत पर सवाल खड़े करता हो। संसद की सर्वोच्चता अगर शिथिलता का रूप ले ले और सिर्फ बहिष्कार और बहिर्गमन का मंच बन कर रह जाए तो समाज के कबीर क्या करें? क्या उस सिविल सोसायटी की तरफ मुड़े जिसका निर्माण कबीर ने अपने समय में किया था। पुरुषोत्तम अग्रवाल जिसे लोकवृत्त कहते हैं। लोकवृत्त और सिविल सोसायटी की तुलना नहीं की जा सकती मगर कबीर के होने और उनकी ज़रूरत पर किसे संदेह हो सकता है। आज की आधुनिकता अब कई मायनों में भ्रामक लगने लगी है। इसकी सही पहचान और छानबीन के लिए कबीर को फिर से खोजना होगा। क्या यह कम बड़ी बात नहीं कि कबीर को लोग उनकी रचनावलियों को याद रखने से नहीं जानते, संकट के समय बग़ावत के मिज़ाज से ज्यादा जानते हैं। कबीर ने देशज आधुनिकता को गढ़ा तो क्या आज की सेंसेक्स आधुनिकता में कबीर के लिए कोई गुज़ाइश बची है? ज़रूर बची है तभी कबीर हर तरफ दिखाई पड़ जाते हैं। शायद इसीलिए भी कि बाज़ारू ज़ुबान में भी निष्पक्ष बगावत का कबीर से बड़ा कोई ब्रांड नहीं है। जिस बाज़ार को कबीर माया महाठगिनी कहते हैं।
कबीर पर लिखने की हिम्मत कर बैठा। कुछ मूर्खतापूर्ण बातें कह गया तो माफ कीजिएगा। सचमुच कम जानता हूं कबीर के बारे में।
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