आज फिर चलते चलते , ब्रेक पर पैर जैसे जम गए , लगा पीछे से फिर किसी ने पुकारा . वही चिर परिचित आवाज का आभास , घूम कर देखा तो कोई दिखा नहीं , इस दुनिआवी भीड़ में एक आवाज की तरह .
पर यह आवाज जैसे जानी पहचानी सी लगी .
दूर किसी देश में भयंकर तूफ़ान आने की खबर ने जैसे होश ही उड़ा दिए हैं .
लगा जैसे कई अपने फंसे हैं वहां ,
ह्रदय का तूफ़ान भी वैसा ही होता है शायद .अपने साथ कई यादें ले आता है और ले भी जाता है .
बस धड़कन का चलते रहना जारी रहता है .
आशा करता हूँ सब ठीक ही होगा . जैसा चल रहा था वैसा ही चलता रहेगा , भारतीय संविधान की तरह.
किस तरह हम चलते चलते अजनबी से दोस्त , दोस्त से रिश्तेदार , और फिर रिश्तेदार से दोस्त , दोस्त से अजनबी बन जाते हैं .
रूठना-मानना तो खैर ,जीवन चक्र का साथ चलता रहता है .
मेरा इस शहर की गलियों में घूमना अभी तक बदस्तूर जारी है ,
आज भी अपने उस ब्रम्हावाक्य पे कायम हूँ .
कभी ख़तम न होने वाली तलाश की तरह . वैसे भी आज मंगलवार है ,
कुछ अमंगल नहीं होगा आज ,
चिरकुट कवि चंपक के बोल याद आ रहें हैं ..
बहारों के लुट जाने के मौसम में बरसात आई है, चलो कुछ दूर निकलते हैं, कुछ याद आई है |
लेकिन आज तो बरसात भी नहीं आई है .
अब सब कुछ पर लगाम लगा लिया गया है, मामला ज़ुबान से लेकर ज़हन तक पहुंच गया है |
इसी बिस्वास के साथ , मुस्कुराने की आदत से मजबूर शाम को रंगीन किये जा रहा हूँ .
ऐसे ही एक गली के मोड़ पे दोस्तों के साथ "मिटटी" के कुल्हड़ में चाय पीते पीते ख्याल आया ,एह भी एक चाय है और एक वो अमीरों वाली , जिसे लोग café कह कर ,संस्कृति से जोड़ कर मजा लेते हैं .
कहा तो यहाँ तक गया है … ‘’एक प्याले चाय के साथ बहुत कुछ हो सकता है ’’ .
" औकात की हर लड़ाई का हथियार अंग्रेजी थोड़े न है। "
मगर मिटटी के कुल्हड़ की बात ही कुछ और है .
रात हो चुकी है .. लोग अपने घरों को जा रहे हैं .. शायद यही परंपरा चली आ रही है की रात होते ही अपने अपने घरों की ओर लौट चलना पड़ता है ,
खुद ब खुद .
स्वचालित मशीन की तरह |
किताबों में पढ़ा करते थे की शाम होते ही गायें और तमाम सारे पालतू पशु , आपने अपने वास-स्थान की और चल पड़ते थे .
आदत आभी भी बनी हुई है .
इन सब भाग दौड़ के बीच मैं भी खुद को असंख्य लोगों के समुन्दर में तैरता पाता हूँ .
और तैरता ही जा रहा हूँ ,
इसी उम्मीद साथ के कभी कोई किनारा दिख ही जायेगा .
लेकिन आज तो बरसात भी नहीं आई है .
अब सब कुछ पर लगाम लगा लिया गया है, मामला ज़ुबान से लेकर ज़हन तक पहुंच गया है |
इसी बिस्वास के साथ , मुस्कुराने की आदत से मजबूर शाम को रंगीन किये जा रहा हूँ .
ऐसे ही एक गली के मोड़ पे दोस्तों के साथ "मिटटी" के कुल्हड़ में चाय पीते पीते ख्याल आया ,एह भी एक चाय है और एक वो अमीरों वाली , जिसे लोग café कह कर ,संस्कृति से जोड़ कर मजा लेते हैं .
कहा तो यहाँ तक गया है … ‘’एक प्याले चाय के साथ बहुत कुछ हो सकता है ’’ .
" औकात की हर लड़ाई का हथियार अंग्रेजी थोड़े न है। "
मगर मिटटी के कुल्हड़ की बात ही कुछ और है .
रात हो चुकी है .. लोग अपने घरों को जा रहे हैं .. शायद यही परंपरा चली आ रही है की रात होते ही अपने अपने घरों की ओर लौट चलना पड़ता है ,
खुद ब खुद .
स्वचालित मशीन की तरह |
किताबों में पढ़ा करते थे की शाम होते ही गायें और तमाम सारे पालतू पशु , आपने अपने वास-स्थान की और चल पड़ते थे .
आदत आभी भी बनी हुई है .
इन सब भाग दौड़ के बीच मैं भी खुद को असंख्य लोगों के समुन्दर में तैरता पाता हूँ .
और तैरता ही जा रहा हूँ ,
इसी उम्मीद साथ के कभी कोई किनारा दिख ही जायेगा .
दोपहर सी लंबी हो चली हैं बेकरारियां, गर्मियों में इंतज़ार लंबा हो जाता है
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