Wednesday, May 25, 2011



आज फिर  चलते  चलते  , ब्रेक  पर  पैर  जैसे  जम  गए , लगा  पीछे  से  फिर  किसी  ने  पुकारा . वही चिर परिचित आवाज का आभास , घूम  कर  देखा  तो  कोई  दिखा  नहीं , इस दुनिआवी भीड़ में एक आवाज की तरह .

पर  यह आवाज  जैसे  जानी  पहचानी  सी  लगी .

दूर  किसी  देश  में भयंकर  तूफ़ान  आने  की  खबर  ने  जैसे  होश  ही  उड़ा  दिए  हैं .

लगा  जैसे  कई  अपने  फंसे  हैं  वहां ,

ह्रदय  का  तूफ़ान  भी  वैसा  ही  होता  है  शायद .अपने साथ कई यादें ले आता है और ले भी जाता है .

बस धड़कन का चलते रहना जारी रहता है .

आशा  करता  हूँ  सब  ठीक  ही  होगा . जैसा चल रहा था वैसा ही चलता रहेगा , भारतीय संविधान की तरह.

किस तरह हम चलते चलते अजनबी से दोस्त , दोस्त से रिश्तेदार , और फिर रिश्तेदार से दोस्त , दोस्त से अजनबी बन जाते हैं .

रूठना-मानना तो खैर ,जीवन चक्र का साथ चलता रहता है .

मेरा  इस  शहर  की  गलियों  में  घूमना  अभी तक  बदस्तूर जारी है ,

आज भी अपने उस ब्रम्हावाक्य पे कायम हूँ .

कभी ख़तम  न  होने  वाली  तलाश  की तरह  . वैसे  भी  आज  मंगलवार  है  ,

कुछ  अमंगल  नहीं  होगा  आज  ,


चिरकुट कवि चंपक के बोल याद आ रहें हैं ..
बहारों के लुट जाने के मौसम में बरसात आई है, चलो कुछ दूर निकलते हैं, कुछ याद आई है |

लेकिन आज तो बरसात भी नहीं आई है .

अब सब कुछ पर लगाम लगा लिया गया है, मामला ज़ुबान से लेकर ज़हन तक पहुंच गया है |

इसी  बिस्वास  के  साथ , मुस्कुराने की  आदत  से मजबूर शाम  को  रंगीन  किये  जा  रहा  हूँ .

ऐसे ही एक  गली  के मोड़  पे  दोस्तों  के  साथ  "मिटटी"  के  कुल्हड़ में  चाय  पीते  पीते  ख्याल  आया ,एह  भी  एक चाय  है  और  एक  वो  अमीरों  वाली  , जिसे  लोग  café  कह  कर  ,संस्कृति  से  जोड़  कर  मजा  लेते  हैं .

कहा  तो  यहाँ तक गया है  … ‘’एक  प्याले  चाय  के  साथ  बहुत  कुछ  हो  सकता  है  ’’ .

" औकात की हर लड़ाई का हथियार अंग्रेजी थोड़े न है। "



मगर  मिटटी  के  कुल्हड़  की  बात  ही  कुछ  और  है .

रात  हो  चुकी  है  .. लोग  अपने  घरों को  जा  रहे  हैं  .. शायद  यही  परंपरा  चली  आ  रही  है  की  रात  होते  ही  अपने  अपने  घरों  की  ओर लौट  चलना  पड़ता  है  ,

खुद  ब  खुद .

स्वचालित मशीन की तरह |

किताबों  में  पढ़ा  करते  थे  की  शाम  होते  ही  गायें  और तमाम सारे  पालतू  पशु  , आपने  अपने  वास-स्थान  की  और  चल  पड़ते  थे .

आदत  आभी  भी  बनी  हुई  है .

इन  सब  भाग  दौड़  के  बीच  मैं  भी  खुद  को  असंख्य लोगों  के  समुन्दर  में  तैरता  पाता  हूँ .

 और  तैरता  ही  जा  रहा  हूँ  ,

इसी   उम्मीद  साथ  के  कभी  कोई  किनारा  दिख  ही  जायेगा .

दोपहर सी लंबी हो चली हैं बेकरारियां, गर्मियों में इंतज़ार लंबा हो जाता है

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