Saturday, September 24, 2011

क्‍यों किसी गाड़ी पर प्रेस लिखा होना चाहिए !!!!

क्या ये लिखना जरूरी है ???

यदि देश भर में यह सर्वेक्षण किया जाए कि दो चक्कों और चार चक्कों वाली गाड़ियों पर सबसे अधिक कौन सा स्टीकर चिपकाया गया होता है? मेरा विश्वास है कि सबसे आगे ‘प्रेस’ ही होगा। गांवों, कस्बो, शहर और महानगर तक में आपकों बड़ी छोटी गाड़ियों पर प्रेस लिखी गाड़ियां आसानी से मिल जाएंगी। कुछ लोग अपनी गाड़ी पर प्रेस लिखवाने के लिए और प्रेस लिखा परिचय पत्र पाने के लिए पैसा खर्च करने को भी तैयार होते हैं। मैंने सुना था, दिल्ली के गुरु तेग बहादुर नगर में कोई संस्था पांच सौ-हजार रुपए लेकर छह महीने-साल भर के लिए प्रेस परिचय पत्र जारी करती थी। यदि महीने में उसने पच्चीस-तीस लोगों का परिचय पत्र भी बनाया तो उसके महीने की आमदनी हो गई पन्द्रह से तीस हजार रुपए की। खैर, यहां मेरा उद्देश्य उनकी आमदनी पर बात करना नहीं है। मैं सिर्फ इतना समझना चाहता हूं कि अपनी गाड़ी पर प्रेस लिखने की ऐसी कौन सी अनिवार्यता है, जो प्रेस लिखे बिना पूरी नहीं होती।
क्यों किसी गाड़ी पर ‘प्रेस’ लिखा होना चाहिए? क्या आज किसी गाड़ी पर आपने पलम्बर, हेयर डिजायनर, एक्टर, सिंगर लिखा देखा है? सिर्फ प्रेस और पुलिस जैसे कुछ पेशे वाले ही अपनी गाड़ी पर अपना परिचय लिखवाते हैं। कुछ सालों से विधायक, सांसद, जिला पार्षद लिखने की परंपरा भी शुरु हुई है। क्या यह स्टीकर सिर्फ रोड़ पर मौजूद दूसरे लोगों पर धौंस जमाने के लिए होता है। या इसकी दूसरी भी कोई उपयोगिता है। किसी गाड़ी पर एम्बुलेन्स लिखा हो तो समझ में आता है। चूंकि एम्बुलेन्स के साथ कई लोगों की जिन्दगी और मौत जुड़ी होती है। यह मामला फायर ब्रिगेड की गाड़ियों के साथ भी जुड़ा है।
वैसे कुछ पत्रकार मित्र यह भी कहेंगे कि रिपोर्टिंग के लिए जाते समय वे किसी बेवजह के पचड़े में ना पड़ें इसलिए वे अपनी गाड़ी पर प्रेस का स्टीकर लगाते हैं। वरना रिपोर्टिंग के दौरान वे बेवजह देर होंगे। यह सच भी है कि एक पत्रकार अपने पाठकों और दर्शकों के प्रति जिम्मेवार होता है। उस तक खबर सही समय पर पहुंचे यह उसकी जिम्मेवारी होती है। वास्तव में विरोध प्रेस के स्टीकर से नहीं है। विरोध है, उसके दुरुपयोग से। जो लोग इस स्टीकर का बेजा इस्तेमाल करते हैं उनसे।

वास्तव में प्रेस के स्टीकर के साथ यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि व्यक्ति उस संस्था का नाम भी साथ में जरुर लिखे, जहां से वह ताल्लुक रखता है। या फिर इस तरह के नियम बनने चाहिए कि प्रेस लिखा स्टीकर अपने पत्रकारों के लिए संस्थान ही जारी करें। इससे सड़क पर प्रेस स्टीकर की अराजकता कम होगी। इसी प्रकार अपने व्यक्तिगत इस्तेमाल के लिए खरीदी गई गाड़ी पर कोई व्यक्ति पुलिस का स्टीकर लगा रहा है? तो यह समझने की बात है कि इसके पीछे उसका क्या उद्देश्य हो सकता है? इस तरह की स्टीकर बाजी पर वास्तव में कुछ नीति बननी चाहिए।

Wednesday, September 7, 2011

Anna & his cap



अन्ना टोपी और कैंडल लाइट डिनर
जिस सड़क के अगले चौराहे पर बाजार होता है, वह किधर से आती है, यह तो पता नहीं, लेकिन इतना जरूर है कि वह हमारे बहुत करीब से गुजरती है। जब अन्ना हजारे हमारे भीतर के स्वप्न को संबोधित कर रहे थे, उसी वक्त एक दूसरे स्तर पर कुछ और भी घट रहा था।


अन्ना नामक विशालकाय वृक्ष के सहारे बाजार की बेल भी फल-फूल रही थी। देखा जाए तो बाजारवाद के फंडे ज्यादा जटिल नहीं हैं। मुनाफा बाजार की धुरी है। बाजार मुनाफे की भाषा बखूबी पहचानता है और जहां मुनाफा हो, बाजार की बयार भी उसी ओर बहती है। फिर भले वह क्रिकेट मैच हो, फिल्मी गीत हो या कोई अनशन।

हुआ यूं कि हाल ही में मेरी नजर चिप्स के एक विज्ञापन पर पड़ी। देश का युवा बारिश में भीगते हुए बदलाव लाने की बात कर रहा है और सबके हाथों में मोमबत्तियां हैं। इतने में हीरो चिप्स लेकर एक लड़की के पास जाता है और पूछता है : ‘कैंडल लाइट मार्च के बाद कैंडल लाइट डिनर पर चलें!’ चूंकि वह यह पूछते हुए लड़की को चिप्स ऑफर करता है, तो वह मना नहीं कर पाती।

लब्बोलुआब यह कि बदलाव की बगावत के दौरान आप दिल भी लगा सकते हैं। ऐसा ही एक और वाकया देखने को मिला। जब अन्ना का अनशन चल रहा था, तब मेरे एक दोस्त के पास एक ई-मेल आया। शीर्षक था ‘आई एम अन्ना’। यह जुमला अब ‘गुड मॉर्निग’ और ‘हाऊ आर यू’ की तरह आम हो चला है, इसके बावजूद उसने मेल खोला। मेल का मसौदा कुछ इस तरह था : ‘देश में इस वक्त जो मुहिम चल रही है, आप उससे वाकिफ होंगे।

इस वक्त सच का साथ देना जरूरी है और सही को चुनना भी। सही जीवनसाथी चुनना भी बहुत अहम है। यदि आप सही जीवनसाथी चुनना चाहते हैं, तो फलां-फलां मैट्रिमोनी पर लॉग-इन करें।’ मजे की बात यह है कि खुद अन्ना ने भी नहीं सोचा होगा कि इस तरह उनके आंदोलन की एक मार्केट वैल्यू बनेगी और उसे भुनाने के लिए बाजार अपनी आस्तीनें चढ़ा लेगा। अन्ना टोपी का एक स्टाइल स्टेटमेंट बन जाना इसी की बानगी है।

ऐसा नहीं है कि सिर्फ प्रोडक्ट मार्केटिंग के लिए ही इस आंदोलन का सहारा लिया गया। टीवी सीरियल्स भी पीछे नहीं थे। शरद जोशी की कहानियों पर आधारित एक धारावाहिक के एक सुपरिचित किरदार पिछले दिनों एक एपिसोड में अन्ना टोपी पहने नजर आए।

हो सकता है आंदोलन में भागीदारी करने का यह उनका अपना तरीका हो, लेकिन हमें तो यही लगा कि जिस तरह होली-दिवाली के मौके पर हमारे सीरियलों में भी त्योहार मनाए जाते हैं, ठीक उसी तरह इस आंदोलन के दौरान भी हमारे सीरियल उसी के रंग में रंग जाना चाहते थे।

अलबत्ता इन तमाम गतिविधियों से ये फॉमरूले भी गढ़े जा सकते हैं कि एक अच्छा व्यापारी वही है, जो मौजूदा मुद्दों का रुख अपने प्रोडक्ट की ओर मोड़ना जानता हो और जिसे जनता की नब्ज पर हाथ रखना आता हो। जिसने जनता की नब्ज थाम ली, उसका हाथ जनता की जेब से भला कब तक दूर रह सकता है! हालांकि बाजार यह फॉमरूला जमाने से आजमाता आ रहा है।

इसमें सबसे आगे हैं चॉकलेट कंपनियां, जो भारत में मीठे के मायने बदल देने को तत्पर हैं। चॉकलेट के विज्ञापनों का ही असर है कि इस बार राखी पर मुझे एक बहन भाई को मिठाई की जगह चॉकलेट खिलाती दिखाई दी।

अनेक युवाओं को ‘डर के आगे जीत है’ का नारा भाया है। गुस्ताखियों का गुणगान करने वाले ऐसे नारे भला उन्हें क्यों न भाएंगे और अगर उन्हें भाएंगे तो बाजार द्वारा क्यों न भुनाए जाएंगे? बहरहाल, लगता तो यही है कि जब तक अन्ना की मशाल जलती रहेगी, बाजार भी अपनी खिचड़ी पकाता रहेगा।

एक अच्छा व्यापारी वही है, जो मौजूदा मुद्दों का रुख अपने प्रोडक्ट की ओर मोड़ना जानता हो और जिसे जनता की नब्ज पर हाथ रखना आता हो। जिसने जनता की नब्ज थाम ली, उसका हाथ जनता की जेब से भला कब तक दूर रह सकता है!