एक कहानी, जो कुछ दिन ही पूर्व मुझे एक बालक या नवयुवक जिसकी उम्र लगभग १५ वर्ष होगी, ने सुनाई। जो निश्चित ही मानवता को शर्मसार कर देती है-
नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मैं भोपाल जाने के लिये अपनी ट्रेन का इंतजार कर रहा था। मेरे पास ही बैठा एक १५ वर्ष का बालक बिहार जाने के लिये अपनी ट्रेन का इंतजार कर रहा था। दोनों की ट्रेनें लेट थी अतः मैने टाइम पास करने के लिये उससबालक से बातचीत करना उपयुक्त समझा। मैंने उसके बारे मैं जब पूछा तो जो कहानी सामने आई वह निश्चित ही बहुत ही मार्मिक थी। संक्षेप मेंकहानी इस प्रकार है- मुगल सराय जिले से लगभग ८० किलोमीटर दूर एक छोटे से गाँव में राजकिशोर तथा उसकी पत्नी सुखदेवी मेहनत मजदूरी करके अपने दो बच्चों के साथ कष्ट पूर्ण जीवन व्यतीत कर रहे थे। बेटी राज दुलारी की उम्र लगभग १५ वर्ष एवं बेटा सूरज की उम्र लगभग 12 वर्ष थी। नाम मात्र की खेती थी। जिसे बेचकर पास के ही एक गाँव अपनी बेटी का विवाह कर दिया। अभी दो वर्ष जी बीते थे कि राजकिशोर को कैंसर ने जकड़ लिया। प्रथम तो झाङ फूँक में लगे रहे. फिर गाँव में ही झोला छाप डाक्टर की दवा लेते रहे।
नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मैं भोपाल जाने के लिये अपनी ट्रेन का इंतजार कर रहा था। मेरे पास ही बैठा एक १५ वर्ष का बालक बिहार जाने के लिये अपनी ट्रेन का इंतजार कर रहा था। दोनों की ट्रेनें लेट थी अतः मैने टाइम पास करने के लिये उससबालक से बातचीत करना उपयुक्त समझा। मैंने उसके बारे मैं जब पूछा तो जो कहानी सामने आई वह निश्चित ही बहुत ही मार्मिक थी। संक्षेप मेंकहानी इस प्रकार है- मुगल सराय जिले से लगभग ८० किलोमीटर दूर एक छोटे से गाँव में राजकिशोर तथा उसकी पत्नी सुखदेवी मेहनत मजदूरी करके अपने दो बच्चों के साथ कष्ट पूर्ण जीवन व्यतीत कर रहे थे। बेटी राज दुलारी की उम्र लगभग १५ वर्ष एवं बेटा सूरज की उम्र लगभग 12 वर्ष थी। नाम मात्र की खेती थी। जिसे बेचकर पास के ही एक गाँव अपनी बेटी का विवाह कर दिया। अभी दो वर्ष जी बीते थे कि राजकिशोर को कैंसर ने जकड़ लिया। प्रथम तो झाङ फूँक में लगे रहे. फिर गाँव में ही झोला छाप डाक्टर की दवा लेते रहे।
जब स्थिति ज्यादा बिगङ गई तब डॉक्टर ने शहर के अस्पताल ले जाने की सलाह दी। चूँकि झाङ फूक एवं छोलाझाप डॉक्टरों में जो पैसा पास में था वह खर्च हो गया। रिश्तोंदारों एवं गाँव के लोंगों ने मदद करने से इंकार कर दिया था क्योंकि उनके पास गिरवी रखने के लिये कुछ भी नहीं था। दवा के अभाव में राजकिशोर की मृत्यु हो गई। जैसे तैसे लकङियों का इंतजाम करके दाहसंस्कार कर दिया। समाज के उच्चवर्ग के लोंगो का मृत्युभोज का दबाब आने लगा। चूँकि पीङित परिवार इस तरह का भोज कराने में असमर्थ था। अतः उसने मना कर दिया। उच्च वर्ग के लोंगो ने गाँव से एवं समाज से बहिष्कार का फरमान जारी कर दिया। लेकिन एक सुविधा के साथ कि 10% ब्याज की दर पर मृत्युभोज के लिये 10 हजार रुपये उधार दिये जा सकते हैं। (बीमारी के लिये एक रुपये देने के लिये कोई तैयार नहीं था और अब मृत्यु भोज के लिये कर्ज देने के लिये तैयार) विवशता के कारण पीड़ित परिवार को 10% ब्याज की दर पर 10 हजार रुपये लेकर मृत्युभोज का आयोजन कराना पङा। एक हफ्ते के बाद पैसों का इंतजाम करने का फरमान आने लगा।
सुखदेवी को उच्चवर्ग ने अपने यहाँ (जिसने कर्ज दिया था) केवल दो वक्त की रोटी पर बेगारी करने को विवश कर दिया। उच्चवर्ग के पैसे के लिये अधिक दबाव के कारण सूरज को दिल्ली में काम करने के लिये आना पङा। दिल्ली में वह एक फैक्ट्री में काम करने लगा। मालिक दयावान था सारी कहानी सुनकर उसने सूरज को कर्ज की रकम चुकाने के लिये 10 हजार रुपये एडवांस दे दिये थे। उसकी तनख्वाह 5 हजार थी तथा खाना और रहना मालिक की तरफ से ही था। अब वह अपनी माँ को लेने गाँव जा रहा था।