Saturday, January 12, 2013

धूल

धूल 


धूल ही धूल ,
मीलों फैली हुई धूल ,
गन्दी और मटमैली धूल ।


धूल की चादर ओढ़े सब ,
अंधे और बहरे सब ,
सबको पथ भटकती धूल ।


गली में धुल ,
सड़क पर धुल ,
गाओं में धूल ,
शहरों में धूल ,
दिलों का दिल बेहलाती "दिल्ली " में धूल 
धूल की चादर ओढ़े सब ,
अंधे और बहरे सब ,
सबका दिल बहलाती धुल ।


देश में धूल ,
विदेश में धूल ,
घर के अंदर-बाहर फैली ,
चौखट पर अंधियारी धूल ,
कहीं मिली है ,
कहीं अलग है ।
मिलाती और बिछुड़ाती धूल ।
धूल की चादर ओढ़े सब ,
रोते और बिलखते सब ।
सबका रंग बदलती धुल ।।

Thursday, December 13, 2012

हमें खुद को बदलना होगा !!!! पर क्या ये हो पायेगा ??



एक आम, कड़वी हकीकत यह है कि मतदाता वित्तीय धांधली की ज्यादा परवाह नहीं करते। थोड़ा-बहुत भ्रष्टाचार तो तकरीबन प्रत्याशित और स्वीकार्य माना जाता है। लेकिन जब भ्रष्टाचार व्यापक पैमाने पर प्रत्यक्ष और अक्खड़ तरीके से किया जाता है, तभी हम भारतीय परेशान होते हैं, वह भी थोड़े समय के लिए। मानो हम उनसे कहना चाहते हों कि ‘भ्रष्टाचार करें, लेकिन इतने खुल्लम-खुल्ला तरीके से हमारे मुंह पर नहीं।’ कर चोरी, उलझाऊ लेखांकन और संदिग्ध दोस्तियों को तो भारतीय कारोबारियों के सामान्य व्यवहार की तरह देखा जाता है। हम इसे इस तरह लेते हैं मानो कोई चार प्लेट मिठाई खा ले। इसमें थोड़ी लोलुपता जरूर है, लेकिन चलता है




लेकिन जब हम संदिग्ध कारोबार होते, सरकारी खजाना लुटते या राजनेताओं को निजहित को देशहित से ऊपर रखते हुए देखते हैं, तब हमारे मन में ऐसे भाव नहीं जागते। शक्ति के दुरुपयोग के बारे में भी हम सिर्फ सार्वजनिक जीवन में बात करते हैं। हम चाहते हैं कि राजनेता शक्ति का दुरुपयोग न करें, लेकिन खुद ऐसा करते हैं। एक मिसाल पेश है। भारत में घरेलू नौकर/नौकरानियों का स्तर क्या है? वे काम पर रखने वाले घरमालिक/मालकिन की तुलना में शक्तिहीन होते हैं। अब सोचें कि हम उनके साथ कैसा बर्ताव करते हैं? क्या हम कभी भी उनके लिए न्यूनतम मजदूरी या हफ्ते में एक अनिवार्य छुट्टी की बात करते हैं? जब हमें अपनी शक्ति के दुरुपयोग का कोई मलाल नहीं है, तो दूसरों पर ऐसा करने के लिए हमला करना मुश्किल हो जाता है।

हमें यानी भारतीय समाज को इस पर चिंतन करने की जरूरत है कि हम क्या बन गए हैं। आरएसएस जैसे संगठनों को अपने किसी संदिग्ध कारोबारी सदस्य का बचाव करने के बजाय समाज में उच्च नैतिक मूल्यों की स्थापना पर जोर देना चाहिए। आईएसी (इंडिया अगेंस्ट करप्शन) जैसे संगठनों को भी इस बात का प्रचार करना चाहिए कि यह हमारे भीतर उच्च नैतिक मूल्यों का अभाव ही है, जिसने देश को भ्रष्ट बना दिया है। किसी भी चीज से अधिक हमें खुद को बदलना होगा। नैतिक मूल्यों के बगैर कोई भी समाज चल नहीं सकता, प्रगति करने की तो खैर बात ही छोड़ दें। जब यह अहसास आज की तुलना में कहीं ज्यादा भारतीयों के मन में आ जाएगा, तो हमारे राजनेता भी बदल जाएंगे। ऐसे में राजनीतिक दल भी अपने भ्रष्ट सदस्यों को हटा देंगे। फिलवक्त वे ऐसा नहीं करते, क्योंकि उन्हें लगता है कि आप मतदाताओं को इसकी परवाह नहीं है।

हम फिलहाल बेशर्मी के दौर में रह रहे हैं। जब शर्म हमें उद्वेलित करेगी और हम आत्मचिंतन को प्रवृत्त होंगे, तो हमारा देश बदलाव के लिए तैयार हो जाएगा। हमने भ्रष्ट नेताओं के बारे में कई खुलासे देखे हैं। अब समय आ गया है कि हम अपने आप पर एक खुलासा करें।


पर सवाल ये है की क्या यह मुमकिन हैं ??
क्या ये हो पायेगा ??




इसका जवाब मेरी सोच से परे है ...... हो सकता है (AAP) आपको पता हो

Thursday, November 15, 2012

मानवता !!!!

एक कहानी, जो कुछ दिन ही पूर्व मुझे एक बालक या नवयुवक जिसकी उम्र लगभग १५ वर्ष होगी, ने सुनाई। जो निश्चित ही मानवता को शर्मसार कर देती है-


नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मैं भोपाल जाने के लिये अपनी ट्रेन का इंतजार कर रहा था। मेरे पास ही बैठा एक १५ वर्ष का बालक बिहार जाने के लिये अपनी ट्रेन का इंतजार कर रहा था। दोनों की ट्रेनें लेट थी अतः मैने टाइम पास करने के लिये उससबालक से बातचीत करना उपयुक्त समझा। मैंने उसके बारे मैं जब पूछा तो जो कहानी सामने आई वह निश्चित ही बहुत ही मार्मिक थी। संक्षेप मेंकहानी इस प्रकार है- मुगल सराय जिले से लगभग ८० किलोमीटर दूर एक छोटे से गाँव में राजकिशोर तथा उसकी पत्नी सुखदेवी मेहनत मजदूरी करके अपने दो बच्चों के साथ कष्ट पूर्ण जीवन व्यतीत कर रहे थे। बेटी राज दुलारी की उम्र लगभग १५ वर्ष एवं बेटा सूरज की उम्र लगभग 12 वर्ष थी। नाम मात्र की खेती थी। जिसे बेचकर पास के ही एक गाँव अपनी बेटी का विवाह कर दिया। अभी दो वर्ष जी बीते थे कि राजकिशोर को कैंसर ने जकड़ लिया। प्रथम तो झाङ फूँक में लगे रहे. फिर गाँव में ही झोला छाप डाक्टर की दवा लेते रहे।
 जब स्थिति ज्यादा बिगङ गई तब डॉक्टर ने शहर के अस्पताल ले जाने की सलाह दी। चूँकि झाङ फूक एवं छोलाझाप डॉक्टरों में जो पैसा पास में था वह खर्च हो गया। रिश्तोंदारों एवं गाँव के लोंगों ने मदद करने से इंकार कर दिया था क्योंकि उनके पास गिरवी रखने के लिये कुछ भी नहीं था। दवा के अभाव में राजकिशोर की मृत्यु हो गई। जैसे तैसे लकङियों का इंतजाम करके दाहसंस्कार कर दिया। समाज के उच्चवर्ग के लोंगो का मृत्युभोज का दबाब आने लगा। चूँकि पीङित परिवार इस तरह का भोज कराने में असमर्थ था। अतः उसने मना कर दिया। उच्च वर्ग के लोंगो ने गाँव से एवं समाज से बहिष्कार का फरमान जारी कर दिया। लेकिन एक सुविधा के साथ कि 10% ब्याज की दर पर मृत्युभोज के लिये 10 हजार रुपये उधार दिये जा सकते हैं। (बीमारी के लिये एक रुपये देने के लिये कोई तैयार नहीं था और अब मृत्यु भोज के लिये कर्ज देने के लिये तैयार) विवशता के कारण पीड़ित परिवार को 10% ब्याज की दर पर 10 हजार रुपये लेकर मृत्युभोज का आयोजन कराना पङा। एक हफ्ते के बाद पैसों का इंतजाम करने का फरमान आने लगा। 
सुखदेवी को उच्चवर्ग ने अपने यहाँ (जिसने कर्ज दिया था) केवल दो वक्त की रोटी पर बेगारी करने को विवश कर दिया। उच्चवर्ग के पैसे के लिये अधिक दबाव के कारण सूरज को दिल्ली में काम करने के लिये आना पङा। दिल्ली में वह एक फैक्ट्री में काम करने लगा। मालिक दयावान था सारी कहानी सुनकर उसने सूरज को कर्ज की रकम चुकाने के लिये 10 हजार रुपये एडवांस दे दिये थे। उसकी तनख्वाह 5 हजार थी तथा खाना और रहना मालिक की तरफ से ही था। अब वह अपनी माँ को लेने गाँव जा रहा था।

Wednesday, October 10, 2012

एक किराने वाले की कहानी



ध्यान से पढ़ें।

एक किराना दुकानदार से मिलकर आ रहा हूं।

उनकी जानकारी पर हैरान हूं। जो कहा वो लिख रहा हूं। उसने एक मिसाल दी। तीन चार साल पहले जब आशीर्वाद आटा आया तो थोक में गेहूं 11.50 रुपये प्रति किलो गेहूं मिल रहा था। उसी दाम पर हम आटा चक्की वाले आपको 130 रुपये प्रति दस किलो बेच रहे थे। तब हमारा 140 रुपये प्रति दस किलो था। चूंकी आशीर्वाद के पास पूंजी थी तो कम में बेचा और बाज़ार पर छा गया। लेकिन आज आशीर्वाद दस किलो आटा 240 रुपये का बेचता है और हम 180 रुपये का। थोक में गेहूं 15.50 रुपये प्रति किलो है। तो किसान को कहां ज़्यादा मिला। उपभोक्ता तो ज़्यादा दाम पर ही ख़रीद रहा है। इसलिए किसान के भले की बात पल्ले नहीं पड़ रही है। इतने सालों में दस किलो ग्राम आटे का दाम हमारी चक्की पर 40 रुपये बढ़ा और आशीर्वाद ने 110 रुपये बढ़ाये। इसने जमे जमाए शक्तिभोग की कमर भी तोड़ दी। उसी तरह से टाटा ने मूंग दाल लांच किया है। हाई क्वालिटी की है जो बाज़ार में 80 रुपये प्रति किलो में मिल रही थी । इससे खुदरा मूंग दाल वाले ग़ायब हो गए और अब टाटा की नई पैकेट 100 रुपये प्रति किलो की आ रही है। उसने कहा कि बड़ी कंपनियों के पास घाटा सहने की शक्ति है। जब पड़ोस में मोर का सुपर स्टोर खुला तो हम बर्बाद हो रहे थे लेकिन मंदी आ गई तो लोग दाम का हिसाब लगाने लगे। तब हमारा बिजनेस पिक अप करने लगा लेकिन तभी एक दूसरा मल्टी स्टोर ईजी डे में आ गया। हम पर फिर दबाव बढ़ गया। हम खत्म नहीं हो जायेंगे मगर ज़रूरत क्या है। यह क्यों कहा जा रहा है कि उपभोक्ता और किसान को फायदा होगा। जहां ज़रूरत है वहां निवेश करो। मेट्रो में निवेश का किसी ने विरोध किया। यह भी सही है कि मेट्रो के आने से कारों की बिक्री कम नहीं हुई लेकिन किसी की पूंजी की ताकत से हम कब तक लड़ेंगे। वालमार्ट जहां पर ताकत से खुलेगा वहां हम बर्बाद हो जायेंगे। अभी जो स्टोर खुलते हैं वो ज्यादा दिन नहीं टिक पा रहे हैं। इसलिए हम डूबते उतराते रहते हैं।


एक दुकानदार अपनी समझ से बोले जा रहा था। पूछा कि आपको जानकारी कैसे मिलती है। कहा कि टीवी पर बकवास चलता है हम पेपर ध्यान से पढ़ते हैं।

कहाँ है " दिल्ली का राज्य-पक्षी"





गौरैया, चाची और आंगन। ये मेरे बचपन की यादें हैं। चाची रही नहीं और अब घरों में आंगन भी नहीं रहे। इसलिए गौरैया भी घर में नहीं आती। वे यादें छिन गई जिन्हें लेकर मैं बड़ा हुआ था। जीवन में चहकने और फुदकने के मायने हमने गौरैया से सीखे थे। प्रकृति से पहला नाता भी उसी के जरिए बना था। अब ऊंचे होते मकान, सिकुड़ते खेत, कटते पेड़, सूखते तालाब और फैलते मोबाइल टावरों ने प्यारी गौरैया को हमसे छीन लिया है।
पिछले दिनों गौरैया को दिल्ली का राज्य-पक्षी घोषित किया गया। यह याद करना मुश्किल है कि गौरैया को आखिरी बार मैंने कब देखा था। पक्षी विज्ञानियों की मानें तो गौरैया विलुप्ति की ओर है। इसी चंचल, शोख और खुशमिजाज गौरैया का घोंसला घरों में शुभ माना जाता था। इसके नन्हे बच्चे की किलकारी उस घर की खुशी और संपन्नता का प्रतीक होती थी। हमारे घरों में छोटे बच्चों का पहला परिचय जिस पक्षी से होता था, वह गौरैया ही थी। उसके बाद कौवे से पहचान होती थी। सुनते हैं मेहमान के आने का संदेश देने वाले काग पर भी खतरा है। कौवे भी गायब हो रहे हैं।
चाची अक्सर गौरैया के सहारे ही रोते बच्चों को चुप कराती थी। सुबह की नींद गौरैयों की चहक के साथ टूटती थी। मैं अपने आंगन में हर रोज गौरैया को पकड़ने की विफल चेष्टा के साथ ही बड़ा हुआ। कोई पंद्रह सेंटीमीटर लंबी इस फुदकने वाली चिड़िया को पूरी दुनिया में घरेलू चिड़िया मानते हैं। सामूहिकता में इसका भरोसा है और यह आमतौर पर झुंड में रहती है। मनुष्यों की बस्ती के आसपास घोंसला बनाती है। आज के सजावटी पेड़ों पर इसके घोंसले नहीं होते। इस लिहाज से यह घोर समाजवादी है! दाना चुगती है। साफ -सुथरी जगह पर रहती है। लेकिन हर वातावरण में खुद को ढाल लेने वाली यह चिड़िया अब हमारे बिगड़ते पर्यावरण का दबाव नहीं झेल पा रही है। जीवनशैली में आए बदलाव ने इसका जीना मुहाल कर दिया है। लुप्त होती इस प्रजाति को ‘रेड लिस्ट’ यानी खतरे की सूची में डाला गया है।
गौरैया हमारी आधुनिकता की बलि है। कई बरस पहले जब मेरे घर में छत से लटकने वाला पहला पंखा आया, तो बड़ी खुशी हुई। लगा कि मौसम पर विजय मिली! उसी कमरे के रोशनदान में नन्ही गौरैया का एक छोटा परिवार रहता था। एक रोज गौरैया पंखे से टकरा कर कट गई। इस तरह मासूम गौरैया घर आई आधुनिकता की पहली भेंट चढ़ी। पंखा तो नहीं हट सकता था, सो हमने इंतजाम किया कि गौरैया रोशनदान में न रहे। मेरी मां घर में ही अनाज धोती-सुखाती थी। आंगन में चावल के टूटे दाने गौरैया के लिए डाले जाते थे। गौरैया का झुंड पौ फटते ही आता था। चूं-चूं का उनका सामूहिक संगीत घर में जीवन की ऊर्जा भरता था। अब घर में आंगन नहीं है। पैकेट में बंद अनाज आता है। वातानुकूलन के चलते रोशनदान नहीं है। इसीलिए गौरैया रूठ गई है। वह नहीं आती।
गौरैया समझदार और संवेदनशील चिड़िया है। बच्चों से इसका अपनापा है। रसोई तक आकर चावल का दाना ले जाती है। घर में ही घोंसला बना कर परिवार के साथ रहना चाहती है। मौसम की जानकार है। कवि घाघ और भड्डरी की मानें तो अगर गौरैया ‘धूल स्नान’ करे तो समझिए कि भारी बरसात होने वाली है। तो फिर आखिर क्यों रूठ गई गौरैया? तमाम लोकगीतों, लोककथाओं और आख्यानों में जिस पक्षी का सबसे ज्यादा वर्णन मिलता है, वह गौरैया है। महादेवी वर्मा की एक कहानी का नाम ही है ‘गौरैया।’ उड़ती चिड़िया को पहचानने वाले पक्षी विशेषज्ञ सालिम अली ने अपनी आत्मकथा का नाम ‘एक गौरैया का गिरना’ रखा है। कवि हरिवंश राय बच्चन ने अपनी आत्मकथा ‘नीड़ का निर्माण फिर’ में गौरैया के हवाले से अपनी बात कही है। शेक्सपियर के नाटक ‘हेमलेट’ में भी एक पात्र अपनी बात कहने के लिए गौरैया को जरिया बनाता है। मशहूर शिकारी जिम कार्बेट कालाडूंगी के अपने घर पर रोज हजारों गौरैयों के साथ रहते थे।
देश के अलग-अलग इलाके में जाने पर बोली-भाषा, खान-पान, रस्म-रिवाज सब बदलते जाते हैं, गौरैया नहीं बदलती। हिंदी पट्टी की गौरैया तमिल और मलयालम ‘कुरूवी’ बन जाती है। तेलुगू में इसे ‘पिच्यूका’ और कन्नड़ में ‘गुव्वाच्ची’ कहते हैं। गुजराती में यह ‘चकली’ और मराठी में ‘चीमानी’ हो जाती है। गौरैया को पंजाबी में ‘चिड़ी’, बांग्ला में ‘चराई पाखी’ और उड़िया में ‘घट चिरिया’ कहते हैं। सिंधी में इसे ‘झिरकी’ उर्दू में ‘चिड़िया’ कश्मीरी में ‘चेर’ के नाम से बुलाते हैं।
जैव विविधता पर लगातार बढ़ते संकट से न सरकार अनजान है, न समाज। फिर गौरैया कैसे बचे? हम क्या करें? वह सिर्फ यादों में चहकती है। अतीत के झुरमुट से झांकती है। क्यों यह समाज नन्ही गौरैया के लिए बेगाना हो गया है? इसे अपने आंगन में हमें वापस बुलाना होगा। नहीं तो हम आने वाली पीढ़ी को कैसे बताएंगे कि गौरैया क्या थी! उसे नहीं सुना पाएंगे- ‘चूं चूं करती आई चिड़िया... दाल का दाना लाई चिड़िया!’

Sunday, November 13, 2011

स्वर्ग और नरक

एक बार एक विचारक स्वर्ग और नरक के बारे में उपदेश दे रहे थे .तभी एक पढ़ा लिखा युवा खडा हुआ 
और उपदेशक से पूछा-"श्रीमान ,आप जिस स्वर्ग और नरक के बारे में उपदेश दे रहे हैं वे वास्तव कुछ
 भी नहीं है आप या तो स्वर्ग और नरक का साक्षात्कार करवाये या श्रद्धालु लोगो को बरगलाना बंद करे."

विचारक महोदय ने जबाब दिया -"मैं स्वर्ग और नरक से साक्षात्कार करवा सकता हूँ मगर शर्त ये है 
आप अपने शहर के दस भले और दस बदमाश लोगो को लेकर आये और साथ में एक बीस फिट लम्बी 
सीढ़ी  भी ले आये."

उस युवक ने उपदेशक की बात स्वीकार कर ली और अगले दिन एक सीढ़ी, दस भले और दस बदमाश 
लोगों को लेकर उपदेशक की कुटिया पर पंहुच गया .उपदेशक सबसे पहले दस बदमाशो और सीढ़ी के 
साथ एक सूखे कुएं के पास पहुंचा और बोला -"आप सभी दस व्यक्ति सीढ़ी की सहायता से कुएं के अन्दर 
उतर जाएँ ." उपदेशक की आज्ञा के अनुसार दसों बदमाश सीढ़ी की सहायता से कुएं में उतर गये .उपदेशक 
ने कहा -" ये सीढ़ी हम कुएं से बाहर खीँच लेते हैं आप लोग बिना सीढ़ी के बाहर निकल जाना". इतना कहकर 
उपदेशक ने सीढ़ी को कुए से बाहर खीँच लिया और उस युवक से बोले -इस सीढ़ी को दोनों मिलकर उठा ले 
और पुन: कुटिया पर पहुंचे .

उपदेशक और युवक सीढ़ी को उठाकर कुटिया पर पहुंचे .वहां पर दसों भले लोग उनका इन्तजार कर रहे थे 
उपदेशक ने उन सबको संबोधित करते हुए कहा कि आप लोग मेरे साथ सीढ़ी को लेकर चले .उपदेशक ने 
दुसरे सूखे कुएं के पास पहुँच कर उन सब दस लोगो को आदेश दिया कि आप सभी इस सीढ़ी कि सहायता 
से कुए के अन्दर उतर जाए ,जब दसों भले लोग कुएं में पहुँच गये तो उपदेशक ने कहा-'हम ये सीढ़ी वापस 
खीँच लेते हैं आप बिना सीढ़ी के बाहर निकल आना ."

इतना कहकर उपदेशक ने युवक कि सहायता से सीढ़ी बाहर खीँच लीया .युवक विस्मित सा उपदेशक के 
करतब को देख रहा था पर कुछ समझ नहीं पाया तो उपदेशक से पूछा -महोदय,इस करतब से मेरे प्रश्न 
का हल कैसे आयेगा ?"

उपदेशक बोले-प्रतीक्षा करे और देखे बिना सीढ़ी के कौन कौन बाहर निकल कर आते हैं .कुछ घंटो के बाद 
भले आदमी वाले कुएं से एक आदमी बाहर निकल आया तथा युवक और उपदेशक के पास पड़ी सीढ़ी को 
उठाकर कुएं में पड़े अपने साथियों के पास पहुंचा दी और सीढ़ी की सहायता से एक-एक करके सभी भले 
आदमी बाहर आ गये .उपदेशक ने उनसे पूछा -आपने  इतने गहरे कुए से एक आदमी को बाहर निकालने 
में कैसे सफल हो गये ?

भले आदमी में से एक ने बताया- यह तो बहुत आसान था .हम सबने मिलकर कुएं से बाहर निकलने की 
योजना तैयार की तदुपरांत सबसे पहले चार आदमी खड़े हो गये उनके ऊपर तीन आदमी उनके ऊपर दौ 
और सबसे ऊपर एक आदमी चढ़ गया ,इस प्रयास में बहुत बार असफल भी हुए मगर हार नहीं मानकर 
प्रयास करते रहे और एक आदमी को बाहर निकालने में सफल हो गये और उसके बाद आपके पास पड़ी 
सीढ़ी का उपयोग कर सभी आसानी से  बाहर निकल गये .

उपदेशक ने उस युवक से कहा-आपस में सहयोग करना और मिलजुल कर लक्ष्य की और आगे बढना 
ही स्वर्ग है .

दुसरे कुए से किसी को भी लम्बे इंतजार के बाद में भी बाहर नहीं निकलते देख उपदेशक ने उस युवक 
से कहा-अब तक बदमाश बाहर नहीं आ पाए हैं जरा उधर चल कर माजरा समझ ले .उपदेशक उस युवक 
को लेकर कुए के पास पहुंचे .कुएं के अन्दर से लड़ने -झगड़ने की आवाजे आ रही थी .सभी लहुलुहान 
हो गये थे .उपदेशक ने युवक को कुएं में झांखकर देखने को कहा .सभी बदमाश एक दुसरे के कंधे पर 
चढ़ कर बाहर निकलने की कोशिश कर रहे थे जैसे भी दुसरा घेरा लगता की तभी बाकी बचे आपस में 
लड़ने लग जाते और बंद(घेरा)बिखर जाता और एक दुसरे को मारकर फिर नया बंद बनाने की कोशिश 
करते .

उपदेशक ने युवक से कुएं के अन्दर का हाल पूछा तो युवक ने कहा-महोदय ये सभी" पहले मैं -पहले मैं "
बाहर निकलने की बात पर झगड़ रहे हैं और एक दुसरे की  टांग खींचकर गिर जाते हैं .सभी लहुलुहान 
हो चुके हैं .

उपदेशक ने कहा -वत्स, असहयोग और स्वार्थ की भावना ही नरक है.मुझे लगता है तुम्हे तेरी बात का 
उत्तर मिल गया होगा .यदि स्वर्ग और नरक का साक्षात्कार हो गया हो तो सीढ़ी को कुए में डालकर 
इन बदमाशो को बाहर निकाल दे .

Saturday, September 24, 2011

क्‍यों किसी गाड़ी पर प्रेस लिखा होना चाहिए !!!!

क्या ये लिखना जरूरी है ???

यदि देश भर में यह सर्वेक्षण किया जाए कि दो चक्कों और चार चक्कों वाली गाड़ियों पर सबसे अधिक कौन सा स्टीकर चिपकाया गया होता है? मेरा विश्वास है कि सबसे आगे ‘प्रेस’ ही होगा। गांवों, कस्बो, शहर और महानगर तक में आपकों बड़ी छोटी गाड़ियों पर प्रेस लिखी गाड़ियां आसानी से मिल जाएंगी। कुछ लोग अपनी गाड़ी पर प्रेस लिखवाने के लिए और प्रेस लिखा परिचय पत्र पाने के लिए पैसा खर्च करने को भी तैयार होते हैं। मैंने सुना था, दिल्ली के गुरु तेग बहादुर नगर में कोई संस्था पांच सौ-हजार रुपए लेकर छह महीने-साल भर के लिए प्रेस परिचय पत्र जारी करती थी। यदि महीने में उसने पच्चीस-तीस लोगों का परिचय पत्र भी बनाया तो उसके महीने की आमदनी हो गई पन्द्रह से तीस हजार रुपए की। खैर, यहां मेरा उद्देश्य उनकी आमदनी पर बात करना नहीं है। मैं सिर्फ इतना समझना चाहता हूं कि अपनी गाड़ी पर प्रेस लिखने की ऐसी कौन सी अनिवार्यता है, जो प्रेस लिखे बिना पूरी नहीं होती।
क्यों किसी गाड़ी पर ‘प्रेस’ लिखा होना चाहिए? क्या आज किसी गाड़ी पर आपने पलम्बर, हेयर डिजायनर, एक्टर, सिंगर लिखा देखा है? सिर्फ प्रेस और पुलिस जैसे कुछ पेशे वाले ही अपनी गाड़ी पर अपना परिचय लिखवाते हैं। कुछ सालों से विधायक, सांसद, जिला पार्षद लिखने की परंपरा भी शुरु हुई है। क्या यह स्टीकर सिर्फ रोड़ पर मौजूद दूसरे लोगों पर धौंस जमाने के लिए होता है। या इसकी दूसरी भी कोई उपयोगिता है। किसी गाड़ी पर एम्बुलेन्स लिखा हो तो समझ में आता है। चूंकि एम्बुलेन्स के साथ कई लोगों की जिन्दगी और मौत जुड़ी होती है। यह मामला फायर ब्रिगेड की गाड़ियों के साथ भी जुड़ा है।
वैसे कुछ पत्रकार मित्र यह भी कहेंगे कि रिपोर्टिंग के लिए जाते समय वे किसी बेवजह के पचड़े में ना पड़ें इसलिए वे अपनी गाड़ी पर प्रेस का स्टीकर लगाते हैं। वरना रिपोर्टिंग के दौरान वे बेवजह देर होंगे। यह सच भी है कि एक पत्रकार अपने पाठकों और दर्शकों के प्रति जिम्मेवार होता है। उस तक खबर सही समय पर पहुंचे यह उसकी जिम्मेवारी होती है। वास्तव में विरोध प्रेस के स्टीकर से नहीं है। विरोध है, उसके दुरुपयोग से। जो लोग इस स्टीकर का बेजा इस्तेमाल करते हैं उनसे।

वास्तव में प्रेस के स्टीकर के साथ यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि व्यक्ति उस संस्था का नाम भी साथ में जरुर लिखे, जहां से वह ताल्लुक रखता है। या फिर इस तरह के नियम बनने चाहिए कि प्रेस लिखा स्टीकर अपने पत्रकारों के लिए संस्थान ही जारी करें। इससे सड़क पर प्रेस स्टीकर की अराजकता कम होगी। इसी प्रकार अपने व्यक्तिगत इस्तेमाल के लिए खरीदी गई गाड़ी पर कोई व्यक्ति पुलिस का स्टीकर लगा रहा है? तो यह समझने की बात है कि इसके पीछे उसका क्या उद्देश्य हो सकता है? इस तरह की स्टीकर बाजी पर वास्तव में कुछ नीति बननी चाहिए।