एक आम, कड़वी हकीकत यह है कि मतदाता वित्तीय धांधली की ज्यादा परवाह नहीं करते। थोड़ा-बहुत भ्रष्टाचार तो तकरीबन प्रत्याशित और स्वीकार्य माना जाता है। लेकिन जब भ्रष्टाचार व्यापक पैमाने पर प्रत्यक्ष और अक्खड़ तरीके से किया जाता है, तभी हम भारतीय परेशान होते हैं, वह भी थोड़े समय के लिए। मानो हम उनसे कहना चाहते हों कि ‘भ्रष्टाचार करें, लेकिन इतने खुल्लम-खुल्ला तरीके से हमारे मुंह पर नहीं।’ कर चोरी, उलझाऊ लेखांकन और संदिग्ध दोस्तियों को तो भारतीय कारोबारियों के सामान्य व्यवहार की तरह देखा जाता है। हम इसे इस तरह लेते हैं मानो कोई चार प्लेट मिठाई खा ले। इसमें थोड़ी लोलुपता जरूर है, लेकिन चलता है
लेकिन जब हम संदिग्ध कारोबार होते, सरकारी खजाना लुटते या राजनेताओं को निजहित को देशहित से ऊपर रखते हुए देखते हैं, तब हमारे मन में ऐसे भाव नहीं जागते। शक्ति के दुरुपयोग के बारे में भी हम सिर्फ सार्वजनिक जीवन में बात करते हैं। हम चाहते हैं कि राजनेता शक्ति का दुरुपयोग न करें, लेकिन खुद ऐसा करते हैं। एक मिसाल पेश है। भारत में घरेलू नौकर/नौकरानियों का स्तर क्या है? वे काम पर रखने वाले घरमालिक/मालकिन की तुलना में शक्तिहीन होते हैं। अब सोचें कि हम उनके साथ कैसा बर्ताव करते हैं? क्या हम कभी भी उनके लिए न्यूनतम मजदूरी या हफ्ते में एक अनिवार्य छुट्टी की बात करते हैं? जब हमें अपनी शक्ति के दुरुपयोग का कोई मलाल नहीं है, तो दूसरों पर ऐसा करने के लिए हमला करना मुश्किल हो जाता है।
हमें यानी भारतीय समाज को इस पर चिंतन करने की जरूरत है कि हम क्या बन गए हैं। आरएसएस जैसे संगठनों को अपने किसी संदिग्ध कारोबारी सदस्य का बचाव करने के बजाय समाज में उच्च नैतिक मूल्यों की स्थापना पर जोर देना चाहिए। आईएसी (इंडिया अगेंस्ट करप्शन) जैसे संगठनों को भी इस बात का प्रचार करना चाहिए कि यह हमारे भीतर उच्च नैतिक मूल्यों का अभाव ही है, जिसने देश को भ्रष्ट बना दिया है। किसी भी चीज से अधिक हमें खुद को बदलना होगा। नैतिक मूल्यों के बगैर कोई भी समाज चल नहीं सकता, प्रगति करने की तो खैर बात ही छोड़ दें। जब यह अहसास आज की तुलना में कहीं ज्यादा भारतीयों के मन में आ जाएगा, तो हमारे राजनेता भी बदल जाएंगे। ऐसे में राजनीतिक दल भी अपने भ्रष्ट सदस्यों को हटा देंगे। फिलवक्त वे ऐसा नहीं करते, क्योंकि उन्हें लगता है कि आप मतदाताओं को इसकी परवाह नहीं है।
हम फिलहाल बेशर्मी के दौर में रह रहे हैं। जब शर्म हमें उद्वेलित करेगी और हम आत्मचिंतन को प्रवृत्त होंगे, तो हमारा देश बदलाव के लिए तैयार हो जाएगा। हमने भ्रष्ट नेताओं के बारे में कई खुलासे देखे हैं। अब समय आ गया है कि हम अपने आप पर एक खुलासा करें।
पर सवाल ये है की क्या यह मुमकिन हैं ??
क्या ये हो पायेगा ??
इसका जवाब मेरी सोच से परे है ...... हो सकता है (AAP) आपको पता हो