Saturday, August 27, 2011

मेरा मानना है


बुद्धिजीवी समुदाय से हमेशा यह अपेक्षा की जाती है कि वह समाज को दिशा देगा। एक बेहतर, मानवीय और लोकतांत्रिक समाज के निर्माण में उसकी कारगर भूमिका होगी। लेकिन इस समुदाय के एक हिस्से द्वारा ऐसे तर्क और विचार दिये जा रहे हैं,  जिससे यही बात सामने आ रही है कि अन्ना हजारे और उनकी टीम द्वारा संचालित भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन तथा जनलोकपाल की मांग बेबुनियाद, गलत तथा संविधान विरुद्ध है। अन्ना के आंदोलन का विरोध ऐसे किया जा रहा है जैसे यह कोई अपराधजन्य कार्रवाई है तथा इसके द्वारा संसद, संविधान, कानून के हमारे भव्य व सर्वोच्च 'लोकतांत्रिक' मन्दिर को ढहा देने की साजिश रची जा रही है।
भ्रष्टाचार प्रधान हमारा देश आजकल अन्ना प्रधान देश हो गया है। गूंगे भी अन्ना की प्रशंसा में धाराप्रवाह बोल रहे हैं। धाराप्रवाह बकवास में माहिर नेता गैस पर रखे कुकर में उछलते आलूओं की तरह अन्ना के समर्थन में भ्रष्टाचार को कोसने की प्रतियोगिता में वीरता चक्र हासिल करने पर आमादा हैं। और-तो-और भिखारियों की मंडली में भी फीलगुड की भावनाएं हिलोरें मारने लगी हैं। फुटपाथ पर बैठकर भीख मांगने और रात में सोने तक के लिए पुलिसवालों को पैसे देने पड़ते थे। जिन्हें बैठकर भीख मांगने के लिए ठीया नसीब नहीं था उन्हें जनगणना की ड्यूटी पर लगे सरकारी मास्टरों की तरह घर-घर जाकर भीख मांगनी पड़ती थी। वे भी इस गोल्डन सप्ताह में ठप्पे से रामलीला मैदान जाकर दो टाइम भरपेट इज्जत की रोटी तो क्या तबीयत से तरह-तरह के माल उड़ा रहे हैं।
मुफ्ते माल दिल बेरहम। सब के सिर पर टोपी है, जिस पर लिखा है- मैं अन्ना हूं। ड्यूटी पर तैनात सिपाही उन्हें पहचानकर ऐसे देख रहा है जैसे कि बकरे को कसाई देखता है। वो गुस्से से बुदबुदाता है- अन्ना ने तो अपनी रोटी मर्ज़ी से छोड़ी मगर हमारी दिहाड़ी जबरदस्ती मार दी। सरकार भी निकम्मी है। हम तो बड़े से बड़ा केस ले-देकर हाल सुलटा देते हैं। यहां पूरी सरकार मिलकर भी एक अदद अन्ना को सेट नहीं कर पा रही। किरण बेदी मैडम तो अपने ही महकमे की दबंग अफसरों में रही हैं। वो भी कुछ नहीं कर पा रहीं। अरे अगर सरकार नहीं मान रही तो अन्ना को ही झुकाने की जुगत लगानी चाहिए। अपनी तो जब से यहां ड्यूटी लगी है रोज की दिहाड़ी मारी जा रही है।
अन्ना तो फौज में रहे हैं उन्हें क्या मालूम पुलिस महकमें का दस्तूर। वो स्साला रामलाल ही फायदे में रहा। जिसकी यहां ड्यूटी नहीं लगी। सभी का हिस्सा अकेले ही डकार रहा होगा। रेड़ीवाले, तहबाजारीवाले सभी पर डंडा फिराकर उसने अपनी जन्माष्टमी तो खूब तबीयत से मनाई होगी। अपनी तो बांसुरी इस अन्ना ने बजा रखी है। अरे कानून व्यवस्था का काम पुलिस का है। हमने रातोंरात बाबा रामदेव को निबटा दिया। कैसे सलवार पहनकर भागा था। भागता कैसे नहीं। पुलिस के डंडे के आगे तो भूत भी लंगोटी छोड़कर भाग जाते हैं। ये सरकार तो खामख्वाह मामले को आगे बढ़ा रही हैं।
कहा जा रहा है कि जिस जन लोकपाल को संसद में पारित कराने को लेकर आन्दोलन किया जा रहा है, वह निर्वाचित लोगों द्वारा तैयार नहीं है जबकि संसद एक निर्वाचित संस्था है। क्या संसद सिविल सोसायटी के 'अनिर्वाचित' नुमाइन्दों के सामने घुटने टेक दे। तब रघुरमण और निलकेणी की नियुक्ति के बारे में क्या कहा जायेगा? इनकी नियुक्ति किस लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत की गई है? ये निर्वाचित सांसद नहीं है, यहाँ तक कि ये राजनीतिज्ञ भी नहीं हैं। ये तो कारपोरेट कम्पनियों के सीइओ हैं। ये किनके हितों के लिए प्रतिबद्ध हैं, यह जगजाहिर है। सरकार द्वारा रणनीतिक महत्व के पदों पर इनकी नियुक्ति क्या संसदीय व्यवस्था को नष्ट करना तथा कारपोरेट हितों का पक्षपोषण करना नहीं है? ऐसे अनगिनत मामले हैं। वहीं इसके विपरीत नागरिक समाज के कार्यकर्ता सर्वजनिक व्यक्ति हैं। उनके ड्राफ्ट से हमारी सहमति या असहमति हो सकती है। पर उनके  ड्राफ्ट के विचार तो सबके सामने खुलकर आये हैं। देश में इस पर व्यापक चर्चा हुई है, लोग आज भी अपने विचार प्रकट कर रहे हैं।
यह भी कहा जा रहा है कि अन्ना अपने आमरण अनशन तथा आंदोलन द्वारा दबाव की राजनीति कर रहे हैं। यह 'ब्लैक मेल' है। इस नजर से देखा जाय तो अनशन, भूख हड़ताल, हड़ताल, धरना, घेराव आदि सब 'ब्लैक मेल' ही कहलायेगा जिसका इस्तेमाल मजदूर, किसान और जनता के विभिन्न तबके अपनी माँगों को लेकर करते हैं। लोकतंत्र में आन्दोलन करना, सरकार पर इसके द्वारा दबाव बनाना जनता का लोकतांत्रिक अधिकार है। जन आन्दोलनों के प्रति यह नजरिया न सिर्फ अलोकतांत्रिक है बल्कि फासिस्ट भी है।

No comments:

Post a Comment